पेट में जलन और दर्द होना : Burning in Stomach and Pain in Hindi

आज के परिवेश में पेट में जलन और दर्द होना, बच्चो से लेकर वृद्धो तक में प्रायः देखा जाता है। जिसका मूल कारण हमारी भोजन प्रणाली, जीवनशैली आदि का आयुर्वेद के विरुद्ध और प्रतिकूल होना है। चाहे जानकार हो या अनजाने में ही सही। जिनके उपचारार्थ पेट में जलन के घरेलू उपाय प्रसिद्द है। जबकि आयुर्वेद में पेट में जलन की आयुर्वेदिक दवा और होम्योपैथ में पेट में जलन की होम्योपैथिक दवा का भी विधान है। पेट में जलन होने पर अनेको प्रकार की समस्याए होती है। जैसे – पेट दर्द होना आदि।

पेट में जलन और दर्द होना

आधुनिक जीवनशैली में अर्थ और काम की प्रधानता है। जिसके कारण पुरुष जीविका चलाने के लिए व्यापार, नौकरी आदि तो करते है। परन्तु भोग – विलास, ईर्ष्या आदि के चपेट में पड़कर। दस – दस पीढ़ी के लिए धन इकठ्ठा करने की भावना भी रखते है। जिसकी पूर्ति न होने पर महिलाए भी नौकरी – चाकरी, व्यापार आदि में हाथ आजमाती है। जिससे घर पर खाना बनाने वाला कोई रह नहीं जाता। अंततः हम औद्योगिक खाने को ही खाते है। जो पेट में जलन का कारण है। साथ ही औद्योगिक आचरण आदि का भी अनुशरण करते है। जो स्वस्थ व्यक्ति को रोगी बनाने में प्रबल हेतु है।

आयुर्वेदीय आचार्यो ( चरक, भावप्रकाश आदि ) ने भोजन विसंगति की विद्यमानता, सभी रोगो में सामान्य रूप से स्वीकार की है। जिसका मूल कारण भूख, प्यास आदि को स्वाभाविक रोग माना गया है। जिसकी निवृत्ति को मृत्यु की संज्ञा दी गयी है। अर्थात श्वास – प्रश्वास की क्रिया को पूर्ण काल तक अबाधित रखने के लिए शास्त्रीय, स्वादिष्ट और सुपाच्य भोजन की अनिवार्यता है। जिसमे सन्निहित दोषो का वारन न करने पर रोग अनुगामी है। यह भोजन का सनातन सिद्धांत है। जिसमे मानवो में पाचन क्रिया कैसे सुधारे के मत्वपूर्ण चरण उपयोगी है।

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पेट में जलन होना क्या है ( What is Burning in Stomach in Hindi )

उदर रोगो में पेट में जलन के कारण और उपाय, की चर्चा सनातन शास्त्रों में सनातन काल से हमे प्राप्त है। जिनमे आयुर्वेद आदि में गहनता से विचार किया गया है। पेट में जलन इन इंग्लिश को स्टमक बर्निंग कहते है। पेट में जलन का तात्पर्य पित्त नामक मल का संचय है। जिसके कारण पेट की जलन, गैस इत्यादी समस्याए होती है। जिनको पेट में जलन और दर्द होना in hindi कहते है। कुछ लोग इनको ही पेट में जलन इन हिंदी, के नाम से जानते है। लीवर बढ़ने के कारण भी पेट में जलन आदि होने की संभावना होती है।

मानव शरीर में वात, पित्त और कफ नामक तीन दोष पाए जाते है। जिनमे समानुपातिक संघट्ट ( संतुलन ) होने पर सहज स्वास्थ्य की प्राप्ति, और इनमे असंतुलन होने पर बीमारी प्राप्त होती है। जैसे – पेट में जलन रहना, पेट में जलन पड़ना आदि। जैसाकि ऊपर पेट में जलन होने का कारण पित्त की, अधिकता को बताया गया है। जिसको अग्नि का बढ़ना आदि भी कहते है। खान – पान आदिकी गड़बड़ी पित्त दोष बढ़ाती है। जिनके कारण पेट में जलन पड़ती है। जलन होने पर दर्द स्वाभाविक रूप से होता है। इस कारण जलन और दर्द दोनों एक दुसरे के पूरक है।

आयुर्वेद के अनुसार पित्त दाह ( जलन ) पैदा करती है। नियमित रूपसे संकलित होनेपर यह पेट में जलन करती है। इसके चलते इनको पेट में जलन और दर्द के कारण मानते है। जिसको आयुर्वेद पित्त नाम से सम्बोधित करता है। ऐन केन प्रकारेण मानव शरीर में पित्त की अधिकता को, ही पेट जलने की संज्ञा दी गई है। इनको समझने के लिए पेट में जलन क्यों लगती है, पेट में जलन क्यों रहती है जैसे प्रश्न किये जाते है। प्लीहावृद्धि ( तिल्ली का बढ़ना ) में भी पेट दर्द होता है।

पेट में जलन होने के कारण ( Reason for Burning in Stomach in Hindi )

आयुर्वेदानुसार पेट में होने वाली जलन का कारण तीव्रराग्नि है। जिसका मुख्य हेतु पित्त वृद्धि है। जिसके संचय से जीर्णविबंध होता है। जो पेट में जलन व दर्द का कारण बनता है। पित्त को बढ़ाने वाले अनेको कारक है। जिसमे भोजनाहार, ऋतु परिवर्तन जैसे अनेक हेतु है। जिसके कारण पित्त रोगो का प्रकोप बढ़ता है। जिसको आयुर्वेद ने पित्तोदर रोग कहा है। जबकि पित्तकी अधिकता से फैटी लीवर की समस्या भी जन्मती है। जिसमे पेट से सम्बंधित अनेको तकलीफे होती है।

पेट में जलन होने का कारण 

भोजन में कटु ( सोंठ, मारीच, पीपल, लाल मिर्च, आदि ), अम्ल ( इमली, नीबू आदि ), लवण ( नमकीन ), रसो का अत्यधिक सेवन करने से, बहुत ज्यादा गरम और अति तीक्ष्ण पदार्थो का सेवन करने से, अधिक समय तक धूप में बैठने से, अधिक आग तापने से, जलन कारक आहार द्रव्यों का सेवन करने से, अध्यसन ( बिना भोजन पचे पुनः भोजन करने से ) एवं अजीर्ण से तेजी से एकत्रित पित्त, वात और कफ दोष से मिलकर, उनके मार्गो को रोककर आगे बढ़ता हुआ कुपित होता हुआ। यह पित्त आमाशय में पहुंचकर पाचकाग्नि को समाप्त कर, पेट में जलन पैदा करता है।

ऋतु बदलाव के कारण भी जठराग्नि विसंगति को प्राप्त होती है। जिसके तीन कारण है। जिनको पेट में जलन के कारण इन हिंदी कहा जाता है। पहला वर्षा होने से बारिस के समय धरती से भाप निकलती है। दूसरा वर्षा का होना। तीसरा जल का अम्लविपाकी ( अम्लीय वर्षा ) होने से पित्त आदि दोष कुपित हो जाते है। जिससे पेट में जलन का मार्ग प्रशस्त होता है। सामान्यतः पेट में जलन और दर्द क्यों होता है कोही, पेट में जलन के कारणों के रूप में देखा जाता है। पाचन अग्नि को दुरुश्त करने में अदरक के फायदे है।

कुछ अन्य पेट में जलन के कारण ( Some More Stomach Burning Reasons in Hindi )

इनके अतिरिक्त पेट में जलन किन कारणों से होती है, तो उसमे विरुद्ध आहार, अधिक मल संचय आदि को माना गया है। जिनसे पेट विकारो की उत्पत्ति होती है। विरुद्ध भोजन जैसे – कच्चा – पक्का भोजन एक साथ करना, पान – पके कटहल का एक साथ प्रयोग करना आदि। मल संचय से तात्पर्य पित्तादि मलो का एकत्रीकरण। जिसमे वाह्य और आंतरिक दोनों ही प्रकार के कारण है। वाह्य कारणों में विरुद्ध भोजनहार का सेवन जंक, फ़ास्ट फ़ूड इत्यादी के रूप में करना। और आंतरिक कारणों में पाप ( अशुभ ) कर्म में लगे रहना।   

आयुर्वेद पूर्णतया वैदिक सिद्धांतो पर आधारित है। जिसमे पूर्वजन्म और पुनर्जन्म को स्वीकारा गया है। इनसे ही चिकित्सा की दार्शनिक त्रुटि का वारण होता है। जो समग्र विश्व में आयुर्वेद की अजेयता का ख्यापक है। जबकि अन्य किसी चिकित्सा पद्धतियों को ऐसा स्वीकार्य नहीं। 

पेट में जलन के लक्षण ( Symptoms Of Stomach Burning in Hindi )

  • पूरे शरीर में जलन ( दाह ) होना
  • बुखार होना
  • अधिक प्यास का लगना
  • मूर्च्छा ( बेहोशी ) होना
  • दस्त, पेचिस होना
  • चक्कर आना
  • मुँह और जीभ में कडुआपन
  • आँख, नाखून, त्वचा, चेहरा और मल – मूत्र का हरा या पीला होना
  • पेट का नीला, पीला, हरा और तांबे के रंग की रेखाओ से घिरा हुआ दिखाई देना
  • पेट में जलन और दर्द होना
  • पेट से धुँआ सा उठना
  • पेट से गर्मी निकलना अर्थात पेट का गर्म होना
  • पसीना होना ( अत्यधिक मात्रा में )
  • पेट के ऊपर गीलापन बने रहना
  • पेट को छूने पर नरम लगना
  • शीघ्रपाकी ( हड़बड़ाहट, क्रोधी आदि ) स्वभाव का होना

खाना खाने के बाद पेट में जलन होना ( Stomach Is Burning After Eating in Hindi )

भोजन के बाद पेट में जलन क्यों होती है? यह ऐसी प्रायोगिक समस्या है। जिसका सामना प्रतिदिन हम करते है। खासकर शहरी जीवन जीने वाले। क्योकि आज भी गांव की तुलना में शहर ही, नवीन जीवनशैली और आचार – व्यवहार का अनुकरण करते है। तदुपरांत धीरे – धीरे यह विचार आगे गाँवों की और आगे बढ़ता है। जिसका अनुकरण करने वाले भी उसी समस्या से पीड़ित होते है। जिनसे नगरों में निवास करने वाले होते है। इनसे निपटने का विचार कभी न कभी सभी के मन में आता है। परन्तु उपयुक्त इच्छाशक्ति एवं साधन के अभाव में कुछ नहीं कर पाते।

चिकित्सा की दृष्टि से भोजनोपरांत पेट में जलन होना स्वाभाविक है। जिसका कारण पाचन की क्रिया में भोज्य परमाणुओ की जटिल संरचना का टूटना है। जिसमे ऊर्जा ( गर्मी ) निकलती है। साथ ही इन भोज्य परमाणुओ के पाचन में आमाशय आदि, से अनेको प्रकार के अम्लीय पाचक रस छोड़े जाते है। जो स्वभाव से दाहक ( जलन ) होते है। जिनके कारण खाना खाने के बाद पेट में जलन होती है। इनको जानने के लिए पेट में जलन क्यों रहता है? इत्यादी प्रश्न लोगो द्वारा किया जाता है।

इनको दूर करने के लिए शास्त्रों में सुबह के भोजन के बाद मठ्ठे का और रात्रि के खाने के बाद दूध पीने का विधान है। जिससे भोजन के दाह का नाश होता है। ऐसा न करने पर यह दाह शरीर को सुखाने लगता है। जिससे शरीर जीर्ण शीर्ण हो जाता है। आज के समय में लोगो गुणवत्ता परक और स्वास्थ्यवर्धक भोजन, नियमित खाने के बाद भी पतले दुबले रह जाते है। जिसका इलाज कराने के बाद सफलता नहीं मिलती। जबतक इस समस्या पर ध्यान न दिया जाय।

चटपटे खाद्य पदार्थो को खाने के बाद पेट जलना ( Stomach Burning After Eating Spicy Food in Hindi )

स्वादिष्ट और चटपटे भोजन के बाद पेट में जलन क्यों होते हैं? यह जानना हमारे लिए अति आवश्यक है। क्योकि इस प्रकार की समस्या से आपको भी जूझना पड़ता है। स्वस्थ रहने के लिए इनसे स्वयं को बचाना आवश्यक है। आजकल चटपटे भोजन का निर्माण अपाच्य पदार्थो से किया जाता है। जो खाने में स्वादिष्ट तो है लेकिन पौष्टिक नहीं। जिनका पोषण से कोई लेना देना नहीं।

यह भोजन जहा एक ओर रिफाइंड चीनी एवं स्टार्च, रसायन और क्षतिग्रस्त चर्बी से बने होते है। वही दूसरी ओर अत्यधिक तले – भुने होते है। जिनके कारण चटपटे ( जंक  ) भोजन को अपौष्टिक भोजन का दर्जा दिया गया है। जिसका पाचन करने में टॉक्सिन निष्कासन में दक्ष यकृत भी इनके सामने घुटने टेक देता है। जब पेट में जलन होने के कारण बताइए की बात आती है, तो इनको भी उसमे जोड़कर ही देखा जाना चाहिए।

कहने का आशय इनको पचाने में पेट के अंदर वाले, अंगो को आवश्यक मात्रासे अधिक रस श्रावित करना पड़ता है। जो स्वभाव से अम्लीय होते है। जो पेट में जलन करते है। अधिक समय तक ऐसा होने पर यह अपच आदि का रूप ले लेता है। जिससे पेट में जलन और दर्द होता है। समस्या गंभीर होने पर पेट में जलन और उल्टी भी देखी जाती है। जिसका मुख्य कारण पित्त नामक दोष की व्याप्ति होना है। 

पेट में जलन और दस्त ( Diarrhea With Burning In Stomach in Hindi )

Stomach Burning

कभी – कभी डायरिया के बाद पेट में जलन क्यों पड़ती है? जिसको अतिसार के नाम से भी जाना जाता है। इसका कारण भी पेट में एकत्रित पित्त है। जिसका स्वभाव ही जलनकारक है। जिसमे मल अम्लीय होने के कारण सौम्य त्वचा को छील देता है। जिससे उसमे घाव हो जाता है। जो बवासीर आदि में देखा जाता है। उदर विकार के कारण जब मल विकृति आती है, तो मल के रंग में परिवर्तन, मल का ढीला होना, कडा होना, सूख जाने जैसी समस्याए होती है। जो उदरादि से सम्बंधित रोगो में पाया जाता है।

सीने और पेट में जलन ( Burning In Stomach And Chest in Hindi )

एसिडिटी होने पर गले और पेट  में जलन होती है। जिसको चिकित्सा विज्ञान ने एसिडिटी का लक्षण कहा है। यह वह अवस्था है जब नियमित रूप से इन लक्षणों की प्राप्ति हो। थोड़ा बहुत परिवर्तन होने यह सामान्यतः हो जाता है। जो कोई रोग नहीं अपितु भोजन की विसंगति का संकेत है। जिसकी पुरावृत्ति करने पर इनकी परिणीति रोग में होती है। जिसके लिए विशेषज्ञ की आवश्यकता पड़ती है।

गले और पेट में जलन के क्या कारण है ( Causes Of Burning In Stomach And Throat in Hindi )

पित्त दोष बढ़ने से गले से लेकर पेट में जलन होती है। जिसमे गले में होने वाली गड़वड़ी को गला जलना। और पेट में ऐसा होने को पेट जलना कहते है। एसिडिटी रोग में रोग की तीव्रता के आधार पर पेट, छाती और गले में भी जलन देखी जाती है। जिसको प्रायः पेट में जलन क्यों होते हैं द्वारा प्रकट करते है। जिसका मूल उद्देश्य रोग की जानकारी करना है। जिनके इलाज को गले और पेट में जलन का उपचार कहते है।

पेट में जलन और गैस ( Burning In Stomach And Gas in Hindi )

गैस और पेट में जलन किस कारण से होती है? यह ऐसे प्रश्न है जिनसे हमारा सामना होता रहता है। आज दुनिया में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसको गैस न होती हो। अर्थात लगभग – लगभग सभी को होती है। जिसका मूल कारण आधुनिक विधा से उत्पादित सामाग्रियो का उपभोग है। साथ इनके रख – रखाव, भोजन पकाने और उनके सेवन सभी में विसंगति है। सबसे अधिक ध्यान तो इस बात पर देना चाहिए कि भोजन पकाने वाला ईंधन क्या है?

गैस ही है या कुछ और। जब तक वैदिक व्यवस्था थी तबतक ईंधन के रूप में, गोमय निर्मित कंडो का उपयोग होता था। जिससे गुणवत्ता से युक्त भोजन और प्रदूषण मुक्त वातावरण, साथ ही दूध जैसे दिव्य द्रव्यों की प्राप्ति होती थी। जिनका स्रोत गोवंश आदि थे। ऐसा होने पर दोनों एक दुसरे के लिए उपयोगी थे। जबकि आधुनिकीकरण की चपेट में पड़कर उद्योगों द्वारा वितरित गैस का उपयोग भोजन निर्माण में करते है। जिससे गुणवत्ता में न्यून भोजन, प्रदूषित पर्यावरण और गैस और पेट में जलन जैसे रोगो की प्राप्ति होती है। 

जो हमारी इच्छा के विरुद्ध है अर्थात प्राणघातक है। जिनसे पार पाने के लिए पेट में जलन और गैस का इलाज करवाने की आवश्यकता पड़ती है। जबकि कब्ज होने पर भी गैस की समस्या देखी जाती है। जिसको ठीक करने के लिए कब्ज का रामबाण इलाज, की आवश्यकता पड़ती है। ऐसा न करने पर गंभीर रोग की समस्या हो सकती है।

कमर दर्द और पेट में जलन है तो क्या करें ( Burning In Stomach And Back Pain in Hindi )

आयुर्वेद चिकित्सा में कमर दर्द के साथ पेट में जलन हो, तो इसको वात रोगो के अंतर्गत देखा जाना चाहिए। जिस प्रकार जलन का स्वभाव पित्त में है। उसी प्रकार दर्द की प्रकृति वात की है। जब दर्द और जलन दोनों लक्षणों की प्राप्ति एक साथ होती है। तब पित्त और वात दोनों के मिश्र लक्षण प्राप्त होते है। जिनको वात – पित्त नामक दोष से आयुर्वेद में उच्चारित किया गया है। जिसके लिए ऐसी दवा की अपेक्षा है। जिसमे वात और पित्त दोनों के लक्षणों को दूर करने की शक्ति हो। जैसे – अदरक रस और सेंधा नमक का एक साथ सेवन।

उल्टी और पेट में जलन होता है तो क्या करें ( Burning In Stomach And Nausea in Hindi )

उल्टी और पेट का आपस में गहरा सम्बन्ध है। जिसके विकारग्रस्त होने पर दोनों प्रकार की समस्याए होती है। जिसके लिए पेट में जलन क्यों होता है जैसे प्रश्न किये जाते है। जिनके समाधान में बलवान रोगी की विरेचक द्रव्यों से विरेचन कराया जाता है। जबकि कमजोर रोगियों के लिए वमन आदि का प्रतिषेध है।

छाती में दर्द और पेट में जलन होती है तो क्या करें ( Burning In Stomach And Chest Pain in Hindi )

गैस बनने पर छाती दर्द की समस्या देखी जाती है। जिसका कारण पेट रोगी की वायु का कुपित होना है। यही वायु जब पसलियों में शूल, जकड़न और कभी – कभी ह्रदय गति में रुकावट भी पैदा करती है। परन्तु जलन का मूल गुण पित्त का है। जिसके कारण जलन का दर्द होता है। इसके लिए बेल की छाल को जलाकर बनाये गए, क्षार से तिल तेल को पका विधिनुसार प्रयोग करना फायदेमंद है।

प्रेगनेंसी में पेट में जलन के उपाय ( Burning In The Stomach During Pregnancy in Hindi )

जीवो में गर्भधारण प्रकृति प्रदत्त स्वाभाविक क्रिया है। जिसका सम्पादन सभी जीव अपने कुल संरक्षण में करते है। जबकि चिकित्सा की दृष्टि से यह भहुत ही जटिल प्रक्रिया है। जिसका वर्णन गर्भोपनिषद और चारकादि आयुर्वेद के ग्रंथो में प्राप्त है। जिसमे अनेको प्रकार की शारीरिक और मानसिक क्रिया का योगदान होता है। जिसका नियंत्रक हमारा मतिष्क होता है। मस्तिष्क का नियंता भगवान होते है।

चिकित्सीय परिपेक्ष्य में बात तो हमारा पेट अनेको प्रकार के, अम्लीय संक्रियाओं का सम्मिलित स्वरूप है। जब गर्भकाल का समय होता है। तब इनकी मात्रा में कुछ अधिकता देखी जाती है। जो गर्भ के क्रमिक विकास में सहायक है। जिसके कारण पेट में जलन इन प्रेगनेंसी होती है। इसको ही प्रेगनेंसी में पेट में जलन क्यों देता है द्वारा प्रकट किया जाता है।

पेट की जलन को कैसे ख़तम करे ( How To Stop Burning Stomach in Hindi )

पेट की जलन को कैसे खत्म करे

पेट में होने वाली जलन को समाप्त करने की दो विधिया है। जिनको पेट में जलन के उपाय भी कहते है। पहली सावधानी और दूसरी चिकित्सा। सावधानी में खानपान, योग और व्यायाम आदि है। जबकि चिकित्सा में पेट में जलन के घरेलू उपचार, आयुर्वेदिक उपचार और होम्योपैथिक उपचार है। जिनके द्वारा पेट आदि से सम्बंधित, सभी प्रकार के रोगो की चिकित्सा की जाती है। जिनमे चतुष्पाद चिकित्सा ( द्रव्य, परिचारक, वैज्ञ और रोगी )का विधान है। इनके बिना चिकित्सा को अपूर्ण माना गया है।

ज्यादातर लोग दवा को ही चिकित्सा समझते है। और पेट में जलन है उसका दवा बताइए जैसी बाते करते है। जबकि वास्तव में सिद्धान्तानुसार चरणवद्ध प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। जिसका विसद वर्णन चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, भाव प्रकाश आदि में है। जिसमे कायिक चिकित्सा का सिद्धांत और उनकी प्रक्रिया बतायी गई है। जिनको कारण लोक व्यवहार में इनकी ख्याति है।

जब भी पेट में जलन है उसकी दवाई बताइए कहा जाता है। तो इसका आशय रोगी के लक्षणों की गहनतापूर्वक जांचकर, उपयुक्त औषधि का चयन करना है। जिससे रोगी के रोग का नाश हो और रोगी स्वस्थ्य। इसको ही पेट में जलन का इलाज बताएं, के नाम से भी जाना जाता है। जिनको पेट में जलन होने के कारण और उपाय की भी उपमा दी जाती है। आधुनिक जीवन की स्वस्थ दिनचर्या भी इन रोगो का बचाव करने में सक्षम है।

ध्यान रहे : सरल आयुर्वेदीय उपायों को ही घरेलू उपाय, नुस्खा आदि कहा जाता है। 

पेट में जलन होने के घरेलू उपाय ( Stomach Burning Remedies Home in Hindi )

घरेलू उपायों की प्रसिद्धी आज भी है। जिसका कारण यह जितने सरल है उतने ही उपयोगी भी है। यह सभी हमारे भोजन पाक गृह का हिस्सा है। जिनके कारण इनके किसी भी दुष्प्रभाव की आशंका नहीं होती। यह सभी औषधिया अनादि काल से लेकर अब तक शास्त्र, हम और हमारे पूर्वज तीनो के द्वारा इनको जाचा परखा गया है। जिसको कोई भी फूक मारकर उड़ा नहीं सकता। 

पेट में जलन का घरेलू उपाय जहा दर्शन और विज्ञान में तालमेल स्थापित करता है। वही व्यवहारिक धरातल पर उपयोगी ( रोग उपचार ) भी है। इन्ही विशेषताओं के कारण हर कोई इनका उपयोग सर्वप्रथम करता है। आयुर्वेद के अनुसार दो तिहाई प्रतिशत समस्याओ का समाधान करने की क्षमता इन उपायों में है। जिसमे सोंठ के फायदे और नुकसान भी है। पेट में जलन होने पर कुछ नुस्खे इस प्रकार है –

  • अदरक स्वरस में बराबर मात्रा में दूध मिलाकर पीना।
  • दोपहर के भोजन में अजवाइन का छौक लगा हुआ भोजन खाना। 
  • तिल के तेल को दस गुने अदरक के रस से पकाकर उदररोगी को देना।

पेट में जलन की दवा ( Remedies for Stomach Burning in Hindi )

आयुर्वेद अनेको प्रकार की औषधियों का खजाना है। जिसमे औषधिगत स्वाभाविक गुणों को परखा गया है। जिसको चिकित्सा की भाषा में औषधीय गुण कहते है। जिनके आधार पर त्रिदोषज चिकित्सा की जाती है। जिसमे मुख्यतः कायिक और आघात जन्य चिकित्साए है। जिनको व्यवहारिक जगत में व्याधि कहा जाता है। जिनका आपनोदन कर देने पर स्वभावसिद्ध स्वास्थ्य की अभिव्यक्ति होती है। जिनमे इन द्रव्यों को आयुर्वेद में प्राकृतिक रूप से सिद्ध माना गया है।

हरण, बहेड़ा, आवला, जमालगोटा की जड़, रोहीतक की छाल, सोंठ, मारीच, पीपल, जवाखार, वायविडंग, चीता की जड़, चव्य, देवदारु, गजपीपल, झड़बेर, पिपलीमूल, गोमूत्र, गाय का दूध, भेड़ का दूध, बकरी का दूध, ऊटनी का दूध आदि का प्रयोग होता है। जिनसे रोगी के रोग का उपचार और रोगी की कमजोरी, बेचैनी, उदासी आदि को दूर किया जाता है। यह सब जहा रोग में पाया जाता है। वही चिकित्सा जगत में इनको रोगोपचारक लक्षणों के रूप में देखा जाता है। जिसको बोलचाल की भाषा में पेट में जलन होती है उसकी दवा बताओ कहते है।

लक्षणगत चिकित्सा को मुख्य रूप से दो भागो में बाटा गया है। मानसिक लक्षण और आंगिक लक्षण। जिसमे मानसिक लक्षण को अधिक प्रभावी माना गया है। जब भी लक्षणों की जांचकर इनका निर्धारण किया जाता है। तब ऊपर मानसिक लक्षणों को और नीचे अंग विशेष से, प्राप्त होने लक्षणों स्थान को दिया जाता है। इस प्रकार दोनों में सामंजस्य साधकर चिकित्सा की जाती है। जिससे त्वरित, प्रभावशाली और पूर्ण चिकित्सा का दर्शन प्राप्त होता है। जो सभी रोगो की औषधि चयन का सिद्धांत है। इसके साथ अन्य निषेधात्मक प्रक्रियाए है। जिनका पालन चिकित्सा कार्य में अनुकरणीय है।

पेट में जलन का होम्योपैथिक दवा ( Homeopathy Medicine for Burning in Stomach in Hindi )

होम्योपैथी भी लक्षणगत चिकित्सा है। जिसमे पेट में जलन का होम्योपैथिक मेडिसिन का प्रयोग है। जिनके माध्यम से इस प्रकार के रोगो का इलाज किया जाता है। ठीक उसी प्रकार जैसे एलोपैथिक उपचार में, पेट में जलन की एलोपैथिक मेडिसिन का प्रयोग होता है। दोनों के ही अपने – अपने उपयोग है।

पेट में होने वाली को समाप्त करने के लिए, अनेक होम्योपैथिक दवाओं का प्रयोग होता है। जैसे – आर्सेनिक, सल्फर, ब्रायोनिया, लाइकोपोडियम, मर्क्यूरियस, फास्फोरस, पल्साटिला, सीपिया, कैल्केरिया आदि। जो अपने – अपने स्वभाव के अनुरूप उपयोगी है। उदहारण के लिए आर्सेनिक का रोगी बार बार प्यास लगती है। पर ब्रयोनिया का रोगी को भी बहुत प्यास लगती है। अंतर दोनों में इतना है कि – आर्सेनिक पानी बहुत ही थोड़ी मात्रा में पीता है, और ब्रायोनिया पानी अत्यधिक मात्रा में पीता है। फिर भी दोनों में से किसी की भी प्यास नहीं बुझती है। गला और पेट दोनों जलता रहता है।

पेट में गैस और जलन की आयुर्वेदिक दवा ( Ayurvedic Medicine for Burning in Stomach in Hindi )

उदर सम्बंधित बीमारी होने पर पेट में जलन भूख न लगना, कमजोरी, मन उदास होना जैसे लक्षण पाए जाते है। जिनको दूर करने में इन योगो को उपयोगी माना गया है।

  • चित्रकादि योग – पेट रोगी चीता की जड़ एवं देवदारु का कल्क दूध के साथ पिए। अथवा गजपीपल और सोंठ के कल्क का एक मास तक दूध के साथ सेवन करे।
  • विडंगादि योग – वायविडंग, चीता की जड़, जमालगोटा की जड़, चव्य, सोंठ, मारीच पीपल – सभी को 5 ग्राम लेकर इसका कल्क बना ले और इसी से दूध को पकाए। जिसका सेवन करने से पेट में जलन और दर्द होना साध्य हो जाता है।
  • त्रिफ़लादि क्वाथ – हरड़, बहेड़ा, आंवला, जमालगोटा की जड़, रोहीतक की छाल – इन सभी को बराबर – बराबर लेकर क्वाथ विधि के अनुसार पकाये। जब पक जाए तब उसमे सोंठ, मारीच, पीपल और जवाखार मिलाकर रोगी को पीने के लिए दे।
  • हरीतकी का चूर्ण गोमूत्र के साथ सेवन करने के बाद गाय का दूध पीना चाहिए।

उदर रोगो के अनुबंध से रक्षा के लिए और शारीरिक बल में स्थिरता प्राप्त करने के लिए, सभी चिकित्सीय प्रयोगो के बाद उदर रोगी को गोदुग्ध का प्रयोग करना चाहिए। आयुर्वेद में अनेक लंघन, विरेचन आदि चिकित्सा के अंगभूत प्रयोगो द्वारा, जब रोगी के शरीरावयव क्षीण हो गए हो, और वो जो सभी धातुओ के क्षीण हो जाने के कारण पीड़ित हो। उनके लिए गाय का दूध देवताओ के अमृत पीने के सामान है।

पेट मे जलन और दर्द होने का व्यायाम ( Stomach Burning Exercise in Hindi )

परिश्रम की उपयोगिता का चिकित्सीय महत्व अब आधुनिक विज्ञान भी स्वीकारने लगा है। इसकारण जब भी पेट में जलन के लिए क्या करें? की बात आती है तो हर किसी का ध्यान सबसे पहले दवाई और भोजन पर जाता है। उसके बाद व्यायाम और योग पर जाता है। जिसमे योग द्वारा पेट में जलन का उपाय बताएं, और व्यायाम द्वारा पेट में जलन का उपाय बताइए। जैसी बाते भी आती है। इनके कारण योग आदि को भी रोग से बचने का साधन बताया गया है। जिसको चिकित्सीय महर्षियो ने भी स्वीकारा है।

पेट में जलन के उपाय इन हिंदी की बात करे, तो अधिक परिश्रमादि का निषेध किया गया है। जैसे – अधिक रास्ता चलना, अधिक सवारी करना ( घोड़े की या मोटर यान की ). अधिक भारी सामान नहीं उठाना चाहिए। क्योकि ऐसा करने पर कुम्भक का योग बनता है। जिससे पेट पर अत्यधिक दबाव पड़ता है। जिससे रोग के बढ़ने की संभावना होती है। जबकि आसानी से किये जाने वाले उपायों को करना लाभप्रद है। जैसे – धीरे – धीरे पैदल चलना आदि।

पेट जलन में योग का अद्भुत महत्व है। जिसमे प्राणायाम और आसान दोनों की प्रभावकारी है। जिनका विधिवत प्रयोगकर इन समस्याओ से बचाव कर सकते है। अनुलोम विलोम आदि प्राणायाम वायु को शोधित करता है। जबकि सुखासन, पवनमुक्तासन, मलासन, भुजंगासन आदि पित्त दोषो को संतुलित करते है। जिनके प्रभाव से इस प्रकार की समस्याए नहीं होती। एक प्रकार से यह आसन कब्ज का रामबाण इलाज है।

पेट में जलन होने पर क्या खाना चाहिए ( Stomach Burning Diet in Hindi )

सभी प्रकार के रोगो से पार पाने में भोजन का अद्भुत महत्व है। परन्तु सभी प्रकार के उदर रोगो में अन्न परित्याग का शस्त्रीय विधान है। जिसमे अन्न के स्थान पर संस्कारित दूध सेवन की बात कही गयी है। जैसे – एक सप्ताह भैस के मूत्र का पान करते हुए दूध पीना। या एक माह तक त्रिकटू चूर्ण मिलाकर ऊटनी के दूध का सेवन करना। या तीन महीने तक त्रिकटू चूर्ण मिलाकर बकरी का दूध पीना चाहिए। या एक हजार हरीतकी का सेवन केवल गोदुग्ध पीकर करे। 

वैसे तो पेट रोग में ताजा, पाच्य और हल्का भोजन करना चाहिए। जिसमे शालीचावल, मूग, जौ जैसे अन्नो का सेवन उपयोगी है। साथ ही जांगल प्रदेश में उत्पन्न पशु – पक्षियों के मांस, मूत्र, दूध, मधु, आरिष्ट, आसव और मदिरा आदि का भी प्रयोग बताया गया है। जिनका नियमित सेवन करने से पेट की, सभी समस्याओ से छुटकारा मिल जाता है। लघुपंचमूल पित्तशामक होने के कारण अधिक उपयोगी है। जिसको काढ़े के रूप में बनाया जाता है। जिससे विशेष प्रकार का जूस तैयार होता है। जैसे बुखार की सबसे अच्छी दवा में गिलोय प्रयुक्त होती है।

यवागू ( विशेष विधि से बना भात ) खाना पेट जलने में उपयोगी है। जिसमे साथी चावल को गोमूत्र की सात भावनाए देकर दूध में उबालकर बनाया जाता है। यदि पेट रोगी इसका सेवन पर्याप्त मात्रा में करे। भोजनोपरांत गन्ने का रस पिए। ऐसा करने से पित्त दोष अपने स्थान पर स्थित हो जाते है। अर्थात संतुलित हो जाते है। फलतः पेट की जलन का वारण होता है। यह भी पेट में जलन का घरेलू उपचार जैसा ही है। जो शास्त्रीय होने के कारण चिकित्साविदो के ह्रदय में, सनातन काल से लेकर अब तक आस्था के पात्र है।

पेट में जलन होने पर क्या नहीं खाना चाहिए ( Dont’t Eat When Stomach Is Burning in Hindi )

stomach Burning food

यदि पेट में जलन है तो हमें क्या नहीं खाना चाहिए। यह जानना भी महत्व का है। क्योकि ऐसा न करने पर रोग के प्रबल होने की संभावना होती है। जिससे बचने का एकमात्र उपाय सावधानी रखना है। इन उपायों के अभाव में चिकित्सा व्यवधान होती है। जिससे रोग की पूर्ण चिकित्सा नहीं की जा सकती। रोग का अंश मात्रा भी शेष रहने पर, पुनः इसका प्रभाव अधिक सक्रियता से आता है। जो पहले से अधिक विध्वंसक होता है। जिसकी शास्त्रीय विधि – संहिता इस प्रकार है –

  • जल में और जल प्रधान देश में उत्पन्न होने वाले शाक – पात, पशु – पक्षी, जीव इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • चावल के आटे, तिल आदि द्वारा निर्मित किसी भी वस्तु को नहीं खाना चाहिए।
  • अत्यधिक गरम, कहती, नमकीन पदार्थो का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • विदाहकारक चीजे नहीं कहानी चाहिए। जैसे – अत्यधिक तला भुना ( चाउमीन, मैगी, नूडल्स, चिप्स, कुरकुरे आदि )
  • देर से पचने वाले पदार्थ ( जैसे – पिज्जा, बर्गर आदि ) का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • चीनी, मैदा आदि से बने पदार्थो का सेवन नहीं करना चाहिए। जैसे – ब्रेड, पाँव रोटी, सैंडविच, पैटीज आदि।
  • आवश्यक मात्रा से अधिक जल नहीं पीना चाहिए।

पेट में जलन से सम्बंधित प्रश्न (FAQ Related to Stomach Burning)

प्रेगनेंसी में पेट में जलन क्यों होती है?

गर्भावस्था के दौरान अनेको प्रकार के अम्ल का श्रावण पेट में होता है। जिनके कारण पेट जलता है।

दवा खाने से पेट में जलन क्यों होता है?

यह समस्या एलोपैथी में अधिक पायी जाती है। जिसका कारण इन दवाओं का निर्माण कृत्रिम रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा होता है। जो अम्लीय होने के कारण जलनकारक है।

22 thoughts on “पेट में जलन और दर्द होना : Burning in Stomach and Pain in Hindi”

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