शहद मधु मक्खियों से प्राप्त होने वाला मीठा द्रव है। जिसमे अनेको प्रकार के पोषक तत्व पाए जाते है। जिसकी आवश्यकता हर दिन हमारे शरीर को होती है। लेकिन शहद स्वाभाविक रूप से मीठी होती है। जबकि मधुमेह रोग में हमारी रक्त शर्करा का स्तर भी बढ़ा होता है। ऐसे में सवाल उठता है कि शुगर में शहद खाना चाहिए कि नहीं?

आयुर्वेद के अनुसार शहद वातकारक, गुरु, शीतवीर्य, रस में कषाय, मीठा हड्डियों को जोड़ने वाला एवं मेद का छेदन करने वाला कहा गया है। जिससे यह रक्त पित्त और कफ विकारों का शामक है। जिसके कारण मधु हम सभी के लिए पोषण की दृष्टि से अत्यंत लाभकारी है।
आमतौर पर शहद में जो मिठास होती है। उसकी मुख्य वजह उसमे पाया जाने वाला फ्रक्टोज है। जोकि शर्करा का ही एक प्रकार है, जैसे – ग्लूकोज और सुक्रोज आदि है। जिनको खाने पर मधुमेह रोग से ग्रसित लोगों को शुगर बढ़ने की आशंका बनी रहती है। जैसे मधु प्रमेह रोगी शुगर में नारियल पानी पीना चाहिए या नहीं को लेकर ससंकित रहते है।
शुगर में शहद खाना चाहिए कि नहीं
अयुर्वेद में वातिक एवं उपेक्षित नामक दो प्रकार की मधु प्रमेह की चर्चा की गई है। जिसे हम डायबटीज अथवा शुगर आदि नामों से जानते है। हालाकिं वात प्रधान मधुमेह में वायु के कुपित होने पर, शरीरगत धातु बाहर निकल जाने से क्षय हो जाता है। जिससे यह रोगी का वजन कम कर, उन्हें कमजोर कर देती है।
जबकि उपेक्षित मधुमेह में शरीर गत स्रोतों के अवरुद्ध होने से, वस्ति में दोषों का संचय हो जाता है। जिसके कारन शरीर में मेद आदि की वृद्धि हो जाती है। जिससे हमारा शरीर अपना वजन बढ़ाकर और मोटा हो जाता है।
हालाकिं इन दोनों ही स्थितियों में हमारे शरीर की रक्त शर्करा का स्तर बढ़ जाता है। जो हमारे शरीर से निकलने वाले मूत्रादि में भी जांच कराने पर मालूम पड़ता है। जिसमे आमतौर पर चीनी या हाई ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाली चीजों को खाने से मना किया जाता है। इसलिए शुगर रोगियों में संशय बना रहता है कि शुगर में शहद खाना चाहिए कि नहीं।
शुगर में शहद खा सकते हैं कि नहीं ( sugar me shahad kha sakte hai )

आयुर्वेद ने शहद के मधु, माक्षिक, माध्वीक, मक्षिकावांत, पुष्परसोद्भव आदि नामों से सम्बोधित किया गया है। जोकि मधु बनाने वाली मख्खियों से प्राप्त होता है। आमतौर पर यह मख्खियां फूलों के पराग मकरंद को चूसकर शहद का निर्माण करती है।
जिसका स्वाद आमतौर पर लगभग मीठा या कुछ कषैला मीठा होता है। लेकिन डायबटीज रोगियों को मीठा खाने की मनाही होती है। जिससे उनके मन में शहद सेवन को लेकर सवाल बना रहता है कि शुगर में शहद खाना चाहिए कि नहीं?
चिकित्सीय दृष्टि से शुगर में शहद खाना चाहिए कि नहीं का निर्णय, शहद के प्रकार और उनमे पाए जाने वाले गुणों के आधार पर ही किया जा सकता है। न कि किसी और माध्यम से।
शहद के प्रकार
आयुर्वेद में कुल आठ प्रकार के शहद का वर्णन मिलता है –
- माक्षिक जातीय मधु
- भ्रामर जातीय मधु
- क्षादर जातीय मधु
- पौत्तिक जातीय मधु
- छात्र जातीय मधु
- आर्घ्य जातीय मधु
- औद्दालक जातीय मधु
- दाल जातीय मधु
असल में जिस प्रकार की मक्खी से जो शहद प्राप्त होता है। उसे उसी नाम से जाना जाता है। जिससे इनके गुणों में भेद की प्राप्ति होती है।
शहद के गुण
भावप्रकाश आदि में मधु के गुण इस प्रकार बताये गए है –
शहद शीतल, लघु, स्वादिष्ट, रुक्ष, ग्राही, विलेखन, नेत्रों के लिए हितकर, अग्निदीपक, स्वर को उत्तम बनाने वाला, वरन का शोधन और रोपण करने वाला, सुकुमारता करने वाला, सूक्ष्मस्रोतोगामी, स्रोतोमार्ग का अत्यंत शोधन करने वाला, आरम्भ में मधुर अंत में कषाय रस युक्त, आह्लादकारक, अत्यंत प्रसादजनक, शरीर के रंग को उत्तम करने वाला होता है।
इसके साथ मेधाशक्ति को उत्पन्न करने वाला, वीर्यवर्धक, विशद गुणयुक्त, रोचक, योगवाही ( जिसके साथ इसका योग हो उसके सदृश गुण को करने वाला ), थोड़ा वातजनक एवं कुष्ठ, अर्श, कास, पित्त, रक्तविकार, कफ, प्रमेह, क्लांति,कृमि, मेद, तृषा, वमन, श्वास, हिचकी, अतिसार, मलबन्ध, दाह, क्षत, और क्षय को नष्ट करने वाला होता है।
मधुमेह में शहद के फायदे

प्रमेह रोगियों में प्रायः दो तरह के बदलाव दिखाई पड़ते है –
- रोगी का बहुत अधिक मोटा हो जाना
- या बहुत दुबला और कमजोर हो जाना
असल में जिसमे व्यक्ति मोटा हो जाता है। उसमे स्रोतों के आवृत्त होने से पितादि दोष वस्ति में इकठ्ठा हो जाते है।जिसमे मुख्य रूप से कफ, पित्त एवं इनके सम्मिलित दोषों की प्रवणता पाई जाती है। जिसे अयुर्वेद में उपेक्षित प्रमेह के नाम से जाना जाता है। जिसको दूर करने में शहद बहुत ही गुणकारी औषधि है। फिर भी आम जनमानस में असमंजस बना रहता है कि शुगर में शहद खाना चाहिए कि नहीं।
जिस प्रमेह रोग में वायु के कुपित हो जाने से, धातुए अत्यधिक मात्रा में निकल जाती है। जिससे रोगी कृश और कमजोर हो जाता है। वो वात प्रधान मधु प्रमेही है। जिसे आयुर्वेद ने वातिक प्रमेह कहा है। जिसमे निम्नलिखित दोष हो सकते है –
- वात ( एक दोषज )
- वात – पित्त ( द्विदोषज )
- वात – कफ ( द्विदोषज )
- वात पित्त कफ ( त्रिदोषज या सन्निपातिक )
जबकि शहद अपने आप में थोड़ा वातकारक है। जिसके कारण शहद का सेवन वात रोगी को सीमित मात्रा में ही करना चाहिए। लेकिन अयुर्वेद में अनुपान भेद से मधु प्रमेह आदि रोगों में मधु के सेवन का विधान किया। न कि बगैर अनुपान के।
निष्कर्ष
कफज, पित्तज और कफ पित्तज प्रमेह में मधु का सेवन अत्यंत गुणकारी है। जबकि शहद कुछ वात कारक माना गया है। जिससे वात दोषज या मिश्रित वात दोषज विकारों में, शहद का सेवन बहुत ही सावधानी पूर्वक करना आवश्यक है।
ध्यान रहे : शहद मधुमेह रोगोयों के लिए चीनी का विकल्प नहीं, बल्कि एक औषधि है।
उद्धरण
- चरक संहिता चिकित्सा अध्याय – 06
- सुश्रुत संहिता चिकित्सा अध्याय – 11
- अष्टांगहृदयम चिकित्सा अध्याय – 06
- अष्टांगसंग्रह चिकित्सा अध्याय – 14
- भावप्रकाश निघण्टु मधुवर्गः
- भैषज्यरत्नावली चिकित्सा प्रकरण – 37
FAQ
शहद में शुगर होती है या नहीं?
शहद में फ्रक्टोज नामक चीनी पाई जाती है। जिसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स बहुत कम होता है।
शहद में शुगर की मात्रा पाई जाती है।
हाँ, शहद में फ्रक्टोज नाम की शर्करा पाई जाती है। जिसका पाचन ग्लूकोज की भांति एकाएक नहीं होता। बल्कि धीरे – धीरे होता है। इसलिए शुगर रोग में चीनी की तरह शहद हानिकारक नहीं होता।
क्या मधुमेह में चीनी की जगह शहद का इस्तेमाल किया जा सकता है?
हाँ, आयुर्वेद में मधु का सेवन प्रमेह रोगों के लिए उपकारी बताया गया है। लेकिन चीनी के विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि औषधि के तौर पर लिया जा सकता है।
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