मधुमेह एक दीर्धकालिक चयापचय सम्बन्धी विकार है। जिसमे शरीर रक्त में मौजूद शर्करा ( ग्लूकोज ) को ऊर्जा में बदलने में अक्षम हो जाती है। इस कारण रक्त में चीनी का स्तर तेजी से बढ़ने लगता है। जिसको कम करने के लिए खान – पान का विशेष ध्यान रखना होता है। लेकिन जिन शुगर पीड़ित लोगों को चिकन खाना पसंद है। उन्हें यह जानना जरूरी है कि शुगर में मुर्गा खाना चाहिए या नहीं।

आमतौर पर हमारे आस – पास जो भी शुगर के रोगी है। उनमे से ज्यादातर डायबिटीज टाइप 2 के है। जिनमे वही मुख्य रूप से दो प्रकार की विसंगतिया पायी जाती है –
- वातिक और
- उपेक्षित
जिसमे से वातिक मधुमेह वायु कुपित होकर धातुओं का क्षय हो जाने से होती है। जिससे मधुमेह रोगी देखने में बहुत ही कमजोर और पतला दुबला हो जाता है। जबकि उपेक्षित मधुमेह में शरीर में धातुओं का संचय हो जाता है। जिससे प्रमेह रोगी देखने में मजबूत और मोटा दिखाई पड़ता है। जिसको जड़ से खत्म करने के लिए खाद्य निषेधाज्ञाओं का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। फिर चाहे वह मांसाहारी हो अथवा शाकाहारी।
शुगर में चिकन खा सकते है ( sugar me chicken kha sakte hai )
लेकिन आमतौर पर प्रमेह की शुरुआत उपेक्षित प्रमेह से होती है। जब हम सावधानी नहीं बरतते तो उपेक्षित प्रमेह ही धीरे – धीरे वातिक प्रमेह का रूप ले लेती है। जिससे यह असाध्य रोग की श्रेणी में आ जाती है। ऐसे में यह जानना आवश्यक हो जाता है कि शुगर में मुर्गा खाना चाहिए या नहीं।
मुर्गा / मुर्गी से जो मांस प्राप्त होता है। उसे चिकन कहा जाता है। जो प्रोटीन का अच्छा स्रोत है। जबकि इसके मांस में कार्बोहाइड्रेट नहीं पाया जाता। जिसके कारण इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स शून्य होता है। जिसके कारण मुर्गा खाना डायबिटीज में घातक नहीं माना जाता। लेकिन बहुत से लोगों को भ्रम होता है कि डायबिटीज में मुर्गा खाना चाहिए या नही। ठीक उसी तरह जैसे शुगर में शराब पी सकते है या नहीं।
हालाकिं चिकन को बनाने की कई विधिया है। जिसमे कुछ लोगों को चिकन भुना ( रोस्टेड ) पसंद आता है, तो कुछ को आग पर सेका या बेक ( उबाला ) पसंद आता है। जिसमे आमतोर पर बहुत ही कम तेल मसाले का प्रयोग होता है। जिसको कुछ लोग डायबिटीज का आयुर्वेदिक इलाज भी मानते है। क्योकि इसमें कार्बोहाइड्रेट न होने से ब्लड शुगर नहीं बढ़ाता।
शुगर में मुर्गा खा सकते हैं ( sugar mein murga kha sakte hain )

पर अधिकतर लोग चिकन को तल कर खाना पसंद करते है। जिससे यह स्वादिष्ट होने के साथ – साथ, बहुत ही गरिष्ठ हो जाता है। फिर मधुमेह के रोगियों को पाचन से सम्बंधित समस्या होती है। ऐसे में मधुमेह से पीड़ित चिकन खाने के शौक़ीन लोगो के मन में सवाल होता है कि मधुमेह में मुर्गा खाना चाहिए?
डायबिटीज में कम या न्यून ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले खाद्य पदार्थ को खाना हितकारी है। लेकिन इसके साथ पाचन की समस्या न हो इसका भी ध्यान रखना आवश्यक है। क्योकि जब पाचन नहीं होगा। तब शरीर में दो तरह की गतिविधिया देखी जाएगी।
- धातुओ का संचय या
- धातुओ का क्षय
ऐसे में रोग से पीछा छुड़ाना मुश्किल है। जिसके लिए हमे आयुर्वेदगत संहिताओं का परिपालन करने की नितांत आवश्यकता पड़ती है। जिसके लिए सवाल उठना लाजिमी है कि शुगर में मुर्गा खाना चाहिए या नहीं।
शुगर में मुर्गा खाना चाहिए कि नहीं

लेकिन आयुर्वेद में चोंच तथा पैरों या पंजों से चुगने के लिए दिए गए चावल आदि कणों को जो पक्षी बिखेर कर खाते हैं। जिसमे मुर्गे आदि भी आते है। उनका मांस रस शुगर में खाने की मनाही नहीं है। बल्कि इनके मांस यानी चिकन को खाने का निर्देश नहीं है।
आमतौर पर मुर्गे से जो मांस प्राप्त होता है। उसमे प्रोटीन की मात्रा ही अधिक पायी जाती है। जबकि कार्बोहाइड्रेट बहुत ही कम होता है। जिसके कारण चिकन खाने पर रक्त शर्करा के स्तर पर कोई ख़ास प्रभाव नहीं पड़ता। जिसके कारण शुगर में चिकन खाया जा सकता है। लेकिन बहुत ही सीमित मात्रा में।
क्या शुगर में मुर्गा खाना चाहिए या नहीं
किन्तु शुगर के रोगियों को ध्यान यह रखना चाहिए कि मुर्गा बिना फ्राई वाला ही खाये। क्योकि शुगर की बीमारी में पाचन से सम्बन्धिक समस्याए भी पाई जाते है। जिसमे अधिक तला – भुना, मसालेदार और चटपटा खाना खाने वायु का प्रतिलोमन हो जाता है। जिससे कब्जियत आदि की समस्या अक्सर हो जाया करती है।
वही आयुर्वेद में विष्किर, प्रतुद और जांगल देश में उत्पन्न मृग – पक्षियों के मांसरसों के प्रयोग का निर्देश है। जिनको जौ का भात, कूटे और भुने हुए जौ ( वाट्य ), सत्तू आदि के साथ खाना चाहिए। वह भी उन्हें जिन्हे ये अनुकूल और रुचिकर हो।
निष्कर्ष :
असल में चिकन में प्रोटीन तो पाया जाता है, लेकिन कार्बोहाइड्रेटेट नहीं पाया जाता। जिसके कारण इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स बहुत कम या शून्य होता है। जिससे चिकन खाने पर ब्लड शुगर के बढ़ने का कोई ख़तरा नहीं होता।
जबकि आयुर्वेद में चोंच और पैरों से चुगने के लिए दिए गए, चावल आदि के कणों को जो बिखेर कर खाते है। ( जैसे – कबूतर, मुर्गा, तीतर, बटेर आदि ) उन्हें विष्किर पक्षी कहा जाता है। जबकि बाज ( श्येन ), गीध ( गिद्ध ), कौआ को प्रतुद पक्षी कहा गया है। जिनके मांसरसों को सत्तू, जौ के बात और भुने हुए जौ के साथ खाया जा सकता है। न कि मुर्गे को शुगर में खाने का विधान किया गया है।
उद्धरण :
- चरक संहिता चिकित्सा अध्याय – 06
- सुश्रुत संहिता चिकित्सा अध्याय – 11
- अष्टांगहृदयम चिकित्सा अध्याय – 12
- अष्टांगसंग्रह चिकित्सा अध्याय – 14
- भैषज्यरत्नावली चिकित्सा प्रकरण – 37