शुगर में दही खाना चाहिए या नहीं | sugar me dahi khana chahiye

मधुमेह में आमतौर पर मीठा ( चीनी ) खाने से लोग परहेज करते है। लेकिन दही का स्वाद खट्टा होने से शुगर में इसे बेझिझक खाने की सलाह दी जाती है। किन्तु आयुर्वेद में दही के उष्ण, अम्ल, स्निग्ध, गुरु, शोथ एवं मेद वर्धक आदि मूलभूत गुण माने गए है। जिससे यह पित्त और कफादि दोषों का कारक है। इसलिए यह वातिक और उपेक्षित मधुमेह रोग का जनक है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि शुगर में दही खाना चाहिए या नहीं?  

शुगर में दही खाना चाहिए या नहीं

सामान्यतः शुगर की समस्या तब पायी जाती है। जब हमारा शरीर चीनी ( ग्लूकोज आदि ) का ठीक से प्रबंधन नहीं कर पाता। जिसमे सर्वाधिक भूमिका हमारे अग्नाशय से निकलने वाले इन्सुलिन की होती है। जिसका उत्सर्जन हमारे अग्नाशय के भीतर लैंगरहैंस के आइलेट्स में स्थित बीटा कोशिकाओं से होता है। जो रक्त प्रवाह में जाकर शर्करा के स्तर को नियंत्रित करता है।

आमतौर पर यह नियंत्रण तब तक बना रहता है। जब तक आनुपातिक रूप से इन्सुलिन का निर्माण हमारे शरीर में होता रहता है। जिसकी दो सावधानिया बतलाई गई है। पहली खाद्य संहिताओं में वर्णित विधि निषेधाज्ञाओं का पालन करते रहने पर। दूसरी जब तक किसी रोग के चपेट में नहीं आ जाते। इसलिए मधुमेह से बचाव करने के लिए खानपान सम्बन्धी बारीकियों को समझना अत्यंत आवश्यक है। जैसे शुगर में चावल खाना चाहिए या नहीं।

क्या शुगर में दही खा सकते हैं ( kya sugar mein dahi kha sakte hain )

आधुनिक विधानुरूप शुगर में लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाली वस्तुओ के सेवन पर जोर दिया जाता है। जिसमे मुख्य रूप से कार्बोहाइड्रेट और फाइबर के अनुपात में संतुलन को आधार बनाया गया है। जिसमे सादे ( बिना चीनी वाले ) दही को मधुमेह में सेवन के योग्य बताया गया है। जिसका मुख्य कारण इसके ग्लाइसेमिक इंडेक्स का कम होना माना गया है। 

इसके अतिरिक्त दही पोषण का एक अच्छा स्रोत है। जिसमे प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन B12 आदि पाया जाता है। फिर दही किण्वन की प्रक्रिया से बनती है। जिससे इसे प्रोबायोटिक की संज्ञा दी जाती है। जिसमे कुछ इस प्रकार के जीवाणु पाए जाते है। जो हमारे पेट को स्वस्थ रखने में मदद करते है।   

जबकि आयुर्वेद में पदार्थ के अंदर सन्निहित स्वाभाविक गुणों को आधार बनाया है। क्योकि स्वाभाविक गुणों को किसी भी पदार्थ से किसी भी विधि का आलम्बन लेकर अलग नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा होगा तो उस पदार्थ की विद्यमानता ही नहीं रहेगी। जिससे लोगों में अक्सर भ्रम हो जाता है कि शुगर में दही खाना चाहिए या नहीं। 

शुगर में दही खाना चाहिए कि नहीं

शुगर में दही खाना चाहिए कि नहीं

आयुर्वेद में दही के 5 भेद बतलाए गए है। फिर गौ, महिष, बकरी आदि के दूध से बनने वाले दही के गुणों में भी भेद है। हालाकिं इन सभी दहिओं में गाय के दूध से बनी दही अधिक गुणकारी बताई गई है। लेकिन शुगर में दही के सेवन का सर्वथा निषेध किया गया है। जिसको न जानने वाले लोग सवाल कर ही देते है कि शुगर में दही खाना चाहिए या नहीं।

आयुर्वेद में दही तैयार करने की विधा

  1. पकाये हुए दूध से तैयार किया हुआ दही 
  2. नि:सार दूध का दही
  3. कपडे से छाने हुए दूध का दही 

भावप्रकाश में दूध से दही बनाने की तीन विधियों की चर्चा है। जो अलग – अलग स्थानों पर प्रयोग में लाई जाती है। जिसके अपने – अपने स्वाभाविक गुण भी है। लेकिन इसको लेकर अक्सर संदेह बना रहता है कि शुगर में दही खा सकते हैं या नहीं। जैसे दूध को लेकर संदेह बना रहता है कि शुगर में दूध पीना चाहिए कि नहीं

दही स्वाद में खट्टी होने से अम्लीय गुणों वाली मानी गई है। जबकि आयुर्वेद में दही के शोथकारक, उष्ण, अग्निदीपक आदि गुण बताये गए है। वही हम भोजन में नमक ( लवण ) का इस्तेमाल तो करते ही है। जिसके कारण हमारे भीतर पित्तादि दोष की प्रवणता पाई जाती है। इस आधार पर हम सभी को यह जानना आवश्यक है कि शुगर में दही खाना चाहिए या नहीं?

आखिर शुगर में दही खाना चाहिए या नहीं

आयुर्वेदीय खाद्य संहिताओं के अनुसार दही में कफ दोष को बढ़ाने वाली वस्तुए बताई गई है-

  • दही अपने प्राकृतिक गुणों के कारण कफ कारक होता है। कफ दोष प्रमेह को उत्पन्न करता ही है। जिसका अनदेखा करने पर मधु मेह की प्रवणता पायी जाती है। जिसे कारण अक्सर लोगो में भय बना रहता है कि शुगर में दही खाना चाहिए या नहीं।  

आयुर्वेदीय खाद्य संहिताओं के अनुसार दही में पित्त दोष को बढ़ाने वाली तीन वस्तुए बताई गई है-

  1. उष्ण : दही में यह स्वाभाविक रूप से पाया जाता है। 
  2. अम्ल : स्वाद में खट्टा होने से अम्ल होता ही है। 
  3. लवण : स्वाभाविक रूप से यह दही में पाया नहीं जाता। यह हमेशा बाहर से मिलाया जाता है। 

आयुर्वेदीय खाद्य संहिताओं के अनुसार दही में वात दोष को बढ़ाने वाली तीन वस्तुए बताई गई है-

  1. कटु 
  2. तिक्त 
  3. कषाय 

जब हम दही से बना कोई पकवान बनाकर खाते है। तब छौक आदि के द्वारा इन रसों की प्राप्ति हो ही जाती है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मधुमेह रोगी दही खा सकते है?

शुगर में दही कब खाना चाहिए

शुगर में दही कब खाना चाहिए

आयुर्वेद ने प्रमेह को मूत्र रोगों में स्थान दिया है। जिसमे कफादि दोष मूत्राशय में पहुंचकर, मूत्र को अपने गुण धर्म के अनुरूप दूषित कर अपने – अपने लक्षणों वाले प्रमेह को उत्पन्न करता है। अर्थात जिसमे दही न केवल एक दोषज और द्विदोषज बल्कि त्रिदोषज है। जिसको केवल जानकार लोग ही समझते है। जिसके कारण जनसामान्य लोगो में शंका बनी रहती है कि शुगर में दही खाना चाहिए या नहीं।

रह गई बात दही के सेवन की। तो जब तक प्रमेह रोग की पूर्ण निवृत्ति नहीं हो जाती। तब तक प्रमेह रोगी को दही से परहेज करना परम आवश्यक है। यही कारण है कि खानपान में परहेज को औषधि से भी अधिक महत्वपूर्ण बताया गया है। ऐसे में अब शुगर में दही खाना चाहिए या नहीं का कोई संशय शेष नहीं बचता।

निष्कर्ष :

प्रायोगिक रूप से शुगर रोगियों को अक्सर खाने पीने से सम्बन्धित अनेकों समस्याओं का सामना करना पड़ता है। लेकिन दही स्वादिष्ट, खट्टी और पौष्टिक होने के नाते एक अच्छा विकल्प हो सकता है। किन्तु आयुर्वेदीय खाद्य विशेषज्ञ डायबटीज में दही के सेवन पर सावधानी बरतने की सलाह देते है। ऐसे में सवाल उठता है कि शुगर में दही खाना चाहिए या नहीं?

दही तासीर में गर्म, खट्टी होने से अम्लीय गुणों वाली होती है। जो स्वाभाविक रूप से पित्त प्रमेह की जन्मदात्री है। फिर शोथ, मेह आदि के साथ कफ दोष को उत्पन्न करने वाली है। जिससे दही का सेवन करने पर 4 प्रकार की पित्तज, 10 प्रकार की कफज प्रमेह के होने की आशंका बनी रहती है।

हालाकिं कफज प्रमेह एक दोषज होने से साध्य होती है। जबकि पित्तज प्रमेह द्विदोषज होने से याप्य ( आसानी से साध्य नहीं ) होती है। कफ और पित्त दोष की उपस्थिति में वात दोष स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। जिससे यह त्रिदोषज प्रमेह का रूप धारण कर लेती है। जोकि असाध्य श्रेणी का मधुमेह है। इसकारण आयुर्वेद ने दही को मधु प्रमेह रोग में वर्ज्य पदार्थ की श्रेणी में रखा है।  

ऐसे में शुगर रोगियों अथवा शुगर रोग के कगार पर पहुंच चुके रोगियों को दही से परहेज करना चाहिए। फिर चाहे वह किसी भी श्रेणी का मधुमेह रोगी क्यों न हो। वही आधुनिक चिकित्साविद बिना चीनी या गुड़ मिश्रित दही को शुगर में अच्छा मानते है। जबकि दही के वास्तविक गुण तो उसके स्वाभाविक गुण है। शायद इन्ही विरोधाभाषी बातों के चलते मधुमेह रोगियों की संख्या में दिन ब दिन इजाफा हो रहा है। इसलिए मधुमेह ग्रस्त लोगों को हर उस वस्तु के सेवन से बचना चाहिए। जिसमे दही मिलाया गया हो।  

उद्धरण :

  • माधव निदान अध्याय – 33
  • चरक संहिता चिकित्सा अध्याय – 06
  • चरक सूत्र अध्याय – 27
  • भाव प्रकाश दधि वर्ग 
  • सुश्रुत संहिता चिकित्सा अध्याय – 11
  • योग रत्नाकर मेह निदान
  • भैषज्य रत्नावली अध्याय – 38

FAQ

40 साल की उम्र में शुगर कितना होना चाहिए

40 वर्ष के सामान्य और स्वस्थ व्यक्ति का शुगर खाली पेट 70-100 mg/dl और खाना खाने के 2 घंटे बाद 140 mg/dl होना चाहिए।  

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