अच्छे स्वास्थ्य के लिए पानी कब पीना चाहिए? | When should drink water for good health?

आयुर्वेद के अनुसार पानी सब प्राणियों का प्राण है। सम्पूर्ण संसार जलमय है। इसलिए चिकित्सा में पूर्ण निषेध करने पर भी पानी का निषेध कही नहीं लिया जाता। पानी न मिलने से मुँह सूखने लगता है, अंगों में पीड़ा जैसी समस्याए होती है। फिर पानी न मिलने पर मृत्यु भी हो जाती है। इसलिए हमें यह समझना आवश्यक है कि पानी कब पीना चाहिए?

पानी कब पीना चाहिए?

भूमण्डल पर तीन – चौथाई पानी है। हम मनुष्यों के शारीरिक संघटन में भी 80% के लगभग पानी है। इतना ही नहीं पानी के बिना न तो स्वस्थ और न ही बीमार व्यक्ति का जीवन टिक सकता है। इसलिए पूरा संसार इसमें तन्मय है और यह प्राण है। इस कारण यह समझना अत्यावश्यक है कि पानी कब पीना चाहिए? 

पानी कब पीना चाहिए

आयुर्वेद में पानी पीने के दो नियम बताये गए है –

  1. प्यास लगने पर ( सामान्य )
  2. बिना प्यास के या प्यास न लगने पर ( विशेष )

पानी पीने का सामान्य नियम है। जब प्यास लगे, तब पानी पीना चाहिए। लेकिन यह केवल पानी पीने का समय है। न कि पानी मात्रा और उसकी विधि है। जबकि आयुर्वेद में पानी पीने का समय, मात्रा और पीने की विधि तीनों बतलाई गई है। इसलिए केवल यह पूछना और जानना अधूरा है कि पानी कब पीना चाहिए? जबकि पूरा सवाल यह होना चाहिए कि पानी कब, कितनी मात्रा में और कैसे पीना चाहिए।

इसमें कोई दो राय नहीं कि जब प्यास लगे तब पानी पीना चाहिए। अर्थात जब पानी जीर्ण ( पच ) हो जाय, तब पीना चाहिए। लेकिन वाग्भट्ट और भाव प्रकाश ने प्यास लगने पर पानी पीने से मना नहीं किया है। परन्तु दो बातों पर ध्यान रखने को भी कहा है –

समीक्ष्य मात्रया युक्तममृतं विषमन्यथा  (अष्टांग संग्रह अध्याय -6/32)

  1. प्यास लगने पर भी आवश्यक मात्रा से अधिक जल का सेवन, विष के सामान है। 
  2. और अविधि पूर्वक जल का सेवन भी विष्कारक है।  

अत्यम्बुपानान्न विपच्यतेSन्नमनम्बुपानाच्च च एव दोषः| तस्मान्नरो वह्रिविवर्धनाय मुहुर्मुहुर्वारि पीवेदभूरि

|| भावप्रकाश दिनचर्या प्रकरण श्लोक 157||

मध्ये मध्यान्ग्तां साम्यं धातूनां जरणम सुखम ||अष्टांग संग्रह सूत्र अध्याय – 6/42||

पानी कितनी मात्रा में पीना चाहिए

पानी कितनी मात्रा में पीना चाहिए

आयुर्वेद में पानी पीने की कोई निश्चित मात्रा नहीं निर्धारित की गई है। व्यवहारिक धरातल पर इसे निर्धारित भी नहीं किया जा सकता। जिससे पानी पीने को लेकर तरह – तरह के संशय मन में बनने लगते है। जैसे पानी कब पीना चाहिए? 

जबकि हमारे शरीर में पानी की आवश्यकता निम्नलिखित बिन्दुओ पर निर्भर करती है –

शरीर की स्वाभाविकी दोष प्रकृति

आयुर्वेद के अनुसार हमारे आपके शरीर में वात, पित्त और कफ नामक तीन दोष पाए जाते है। जो हमें स्वाभाविक रूप से अपने – अपने माता – पिता से प्राप्त होते है। जिनको किसी भी कारण से हटाया या मिटाया नहीं जा सकता। केवल और केवल सावधानी पूर्वक इनसे बचा ही जा सकता है।

  • पित्त दोष प्रधान व्यक्तियों को प्रायः अधिक प्यास लगती है।
  • वात दोष प्रधान व्यक्तियों को मध्यम प्यास लगती है।
  • जबकि कफ दोष प्रधान व्यक्तियों को अपेक्षाकृत कम प्यास लगती है।      

ऋतु या मौसम 

अमूमन जब मौसम गर्म होता है। तब हमारे शरीर को पानी कि अधिक आवश्यकता पड़ती है। लेकिन जब मौसम ठंडा होता है। तब हमें पानी कि आवश्यकता कम पड़ती है। जिसकी जानकारी न होने से, हमें जानने की आवश्यकता है कि पानी कब पीना चाहिए?

शारीरिक गतिविधि

कठिन परिश्रम करने वालों को अधिक प्यास लगती है। जैसे – खेती किसानी करना, सर पर बोझा ढोना, खेल कूद करना, दौड़ना भागना आदि। वही जो लोग बैठे – बैठे काम करते है। उन्हें प्रायः कम पानी की आवश्यकता होती है। जिससे लोगों में भ्रम आ जाता है कि पानी कब पीना चाहिए? 

पानी कैसे पीना चाहिए 

पानी कैसे पीना चाहिए 

तस्मान्नरो वह्रिविवर्धनाय मुहुर्मुहुर्वारि पीवेदभूरि || भावप्रकाश दिनचर्या प्रकरण श्लोक 157||

पानी शांतिपूर्वक बैठकर, बड़े एक मिनान से छोटे – छोटे घूँट लेकर धीरे – धीरे पीना चाहिए। न कि खड़े होकर या पैदल चलते और भागते हुए, बड़े – बड़े घूँट लेकर और जल्दी – जल्दी पीना चाहिए। हममे से अधिकांश लोग यह बात नहीं जानते। जिससे इनके दिमाग में एक ही बात आती है कि पानी कब पीना चाहिए?

पानी कब नहीं पीना चाहिए?

अन्न और जल के सेवन में विकृति होने से कफ रोगो का जनन होता है। आयुर्वेद में अकेले कफ रोगों की संख्या सबसे अधिक मानी गई है। इसलिए हम सब को यह पता होना आवश्यक है कि पानी कब पीना चाहिए?

आयुर्वेद में अचानक ताप में अंतर् आने से रोग होने की संभावना पाई जाती है। जैसे –

  • दौड़भाग, मेहनत वाला काम करने के ठीक बाद 
  • धूप से आने के तुरंत बाद
  • गर्म खाद्य वस्तुओ के सेवन के बाद। जैसे – गर्म दूध पीने के बाद पानी पीना।
  • कोई भी फल खाने के ठीक बाद 

क्या प्यास लगने पर ही पानी पीना चाहिए? 

हाँ, पानी हमेशा प्यास लगने पर ही पीना चाहिए। केवल विशेष परिस्थितियों को छोड़कर, बिना प्यास पानी नहीं पीना चाहिए। लेकिन ध्यान रहे कि पानी की मात्रा और विधि दोनों ठीक हो। जिसको जानने और समझने के लिए लोग पानी कब पीना चाहिए की बात करते है?

क्या बिना प्यास लगे भी पानी पीना चाहिए?

हाँ। आयुर्वेद में 3 ऐसे विशेष समय बताये गए है। जब बिना प्यास लगे भी पानी पीना हितकारी है। इसके लिए हमें यह जाना चाहिए कि किन 3 परिस्थितियों में बिना प्यास के भी पानी पीना जरूरी है?

जिसमे मुख्य रूप से तीन समय बताये गए है –

  1. सुबह सोकर उठते ही विस्तार पर
  2. खाना खाने के दौरान बीच – बीच में
  3. खाना खाने के दो – दो घंटे बाद, काम से कम दो बार 

निष्कर्ष :

आयुर्वेद के अनुसार पानी हमेशा सही समय पर, सही मात्रा में और सही विधि से पीना चाहिए। तभी पानी पीने से हमारे स्वास्थ्य में सुधार आ सकता है। जबकि हमारे शरीर को स्वस्थ रखने में, पेट के भीतर की अग्नि का प्रबल योगदान होता है। इसलिए अच्छे स्वास्थ्य का अभिप्राय प्रदीप्त जठराग्नि से है।

जिसके प्रबल रहते हमें पाचन सम्बन्धी विकार नहीं होते है। फिर चाहे वह हमारा अमाशय हो या आते हो। जिन्हे आयुर्वेद में लघु और वृहदांत्र कहा गया है। इस तरह हम सभी प्रकार के रोग और दोष से बचे रहते है। जबकि आजकल हम भोजन के बढ़िया से पचाने आदि के नाम पर, आवश्यकता से अधिक जल का सेवन करने लगे है। जो आयुर्वेद के अनुसार पूर्णतः वर्जित है।   

उद्धरण : 

  • अष्टांग संग्रह सूत्र अध्याय – 06/32,33.34,36,37,41,42 
  • अत्यम्बुपानान्न विपच्यतेSन्नमनम्बुपानाच्च च एव दोषः| तस्मान्नरो वह्रिविवर्धनाय मुहुर्मुहुर्वारि पीवेदभूरि ||भावप्रकाश दिनचर्या प्रकरण – श्लोक 157||

Leave a Comment