हम मनुष्यों के शरीर का लगभग 60% हिस्सा पानी है। लेकिन हमें स्वस्थ रहने के लिए प्रबल अग्नि ( जठराग्नि ) की आवश्यकता होती है। किन्तु पानी अग्नि का सबसे बड़ा शत्रु है। लेकिन बिना पानी के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए हमें यह जानना आवश्यक है कि किन 3 परिस्थितियों में बिना प्यास के भी पानी पीना जरूरी है?

आमतौर पर प्यास के बिना पानी पीना अच्छा नहीं माना जाता। लेकिन प्यास लगी हो तो पानी पीना भी आवश्यक होता है। ऐसे में लोगों के अंदर जल के सेवन को लेकर, अनेको तरह की धारणाए पलने लगती है। जैसे – पानी कब पीना चाहिए आदि आदि।
कुछ भी हो भोजन को ठीक से पचाने में, पानी का अहम योगदान होता है। लेकिन तब जब इसका आयुर्वेद में वर्णित विधि – निषेध के अनुसार उपयोग किया जाय। जिसके लिए इन विधियों को आयुर्वेद के जानकार लोगों से सीखना आवश्यक है। ताकि हम सभी जान सके कि किन 3 परिस्थितियों में बिना प्यास के भी पानी पीना जरूरी है?
आखिर किन 3 परिस्थितियों में बिना प्यास के भी पानी पीना जरूरी है?
असल में हमारे शरीर को अन्न और जल दोनों की आवश्यकता होती है। क्योकि अन्न से हमें ऊर्जा और शक्ति मिलती है। तो जल उस अन्न को पचाने में सहायक होता है। फिर जब तक ठीक से अन्न का पाचन नहीं होगा। तब तक हमें ऊर्जा रूपी शक्ति कैसे मिलेगी? जिसके लिए हमें यह जानना आवश्यक है कि पीने के लिए सबसे अच्छा पानी कौन सा है?
पानी पीने का सामान्य नियम है कि जब भी प्यास लगे। तब आप पानी पी सकते है। यह बात सत्य है। लेकिन पूर्ण सत्य नहीं है। क्योकि आयुर्वेद में हम मनुष्यों के लिए पानी पीने के विधि – निषेध बतलाए गए है। जिसमे से एक है कि किन 3 परिस्थितियों में बिना प्यास के भी पानी पीना जरूरी है?
फिर विधि को हम माने या न माने। लेकिन निषेध का पालन तो हमें हर हाल में करना ही होता है। जिसकी मनमानी करने से, हम रोग की चपेट में आ सकते है अथवा आ ही जाते है। इसलिए आयुर्वेद की निषेधाज्ञाओं का पालन करना, हमारी विवशता है। जिसका अनदेखा करने पर रोग और दोष की प्राप्ति सुनिश्चित है।
आयुर्वेद के दिनचर्या प्रकरण में खान – पान के विधिवत और प्रायोगिक उपाय बातये गए है। जिसमे से कुछ ऐसे है। जो सुनने में तो विपरीत लगते है। लेकिन होते उपयुक्त है। ठीक उसी तरह जिस तरह गणित की गणनाए, अटपटी होने पर भी अनुपयुक्त सरीखे लगने पर भी उपयुक्त होती है।
इसी तरह आयुर्वेद में भी कुछ समय ( काल ) ऐसे निर्धारित किये गए है। जिसमे शरीर की अग्नि की रक्षा के लिए पानी पीना हितकारी है। तो आइये हम जानते है कि किन 3 परिस्थितियों में बिना प्यास के भी पानी पीना जरूरी है?
सुबह सोकर उठते ही बिस्तर पर

बिजली के आविष्कार ने दिन और रात की विभाजक रेखा को ही समाप्त कर दिया है। जिससे अधिकांश लोगों की दिनचर्या पूरी तरह से बदल गई है। आजकल लोगों के दिन की शुरुआत, उनके जरूरत के अनुसार होने लगी है। जिसके कारण कुछ लोग सुबह जल्दी जग जाते है। तो कुछ देर से जगते है।
लेकिन आयुर्वेद ने तो दिन की शुरुआत ब्रह्म मुहूर्त से बताई गई है। जो सूर्य निकलने से लगभग 2 घंटे पूर्व का समय होता है। जिसमे सबसे पहले ऊषापान की बात बतलाई गई है। जबकि आज सोने और जागने का कोई समय निर्धारित नहीं है।
लेकिन आजकल ज्यादातर लोग देर से सोते है और देर से जागते है। फिर मानसिक व्यस्तता के चलते ऊषापान आदि का तो ध्यान ही नहीं रहता। फिर वासना के वसीभूत होने पर कहाँ हमें फुर्सत है? यह जानने कि किन 3 परिस्थितियों में बिना प्यास के भी पानी पीना जरूरी है?
किन्तु हमें स्वस्थ रहने के लिए सोकर उठने के बाद, बिना कुल्ला किये ही पानी पीने के फायदे है। जिसमे जल की लगभग 250 एम एल की मात्रा का सेवन, चाय की चुस्कियों के समान करना अत्यंत लाभदायी है। ऐसा करने से सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि समय से पहले बुढ़ापा नहीं आता है।
खाना खाते समय बीच – बीच में

आयुर्वेद में भोजन के ठीक पहले और बाद में जल सेवन का निषेध किया गया है। जबकि भोजन के बीच – बीच में जल का सेवन अमृत के समान माना गया है। जिसके लिए हमें यह जानना चाहिए है कि भोजन के बीच में थोड़ा – थोड़ा पानी पीना आवश्यक क्यों?
जिस प्रकार प्रातः कालीन जल का सेवन अनिवार्य है। उसी उसी तरह भोजन के बीच – बीच में लगभग 150 एम एल पानी की मात्रा का सेवन करना आवश्यक है। ताकि हमारा भोजन आसानी से पच सके।
ऐसा करने से न केवल हमारे शरीर की अग्नि प्रबल होती है। बल्कि हमारे शरीर के ओज, स्फूर्ति और उमंग में भी बदलाव देखने को मिलता है। जिसका एकमात्र कारण है। हमारे पाचन शक्ति का सुदृढ़ होना।
वही जो लोग भोजन के बीच – बीच में पानी न पीते। वह विविध तरह के उपचार और उपायों के बाद भी पाचन की समस्या से परेशान ही रहते है। इसलिए हमें यह जानने में भलाई है कि किन 3 परिस्थितियों में बिना प्यास के भी पानी पीना जरूरी है?
खाना खाने के दो – दो घंटे बाद कम से कम दो बार

आयुर्वेदीय संहिताओं में स्वस्थ्य सम्बन्धी जितनी जिज्ञासाए हो सकती है। उन सभी शंकाओं का निवारण किया गया है। जैसे पानी को लेकर होती है कि किन 3 परिस्थितियों में बिना प्यास के भी पानी पीना जरूरी है?
आयुर्वेद में भोजन के उपरांत जल का सेवन अनिवार्य माना गया है। लेकिन इसके लिए समय अवधि और जल की मात्रा दोनों का निर्धारण किया गया है।
भोजन करने के दो घंटे बाद काम से कम दो बार, आधा गिलास यानी लगभग 125 एम एल पानी का सेवन बिना प्यास लगे करना भी अत्यंत आवश्यक है।
ऐसा करना इसलिए आवश्यक है। ताकि भोजन को पचाने के लिए जो पाचक रस अमाशय आदि में छोड़े गए है। वो अमाशय आदि की दीवारों को क्षति न पहुचाये। और शरीर में अजीर्णता पलने का कोई स्थान न शेष बचे। जिससे अधिक समय तक हम बीमारियों से बचे रहे।
निष्कर्ष :
आयुर्वेद में खाने – पीने को लेकर, जो विधि निषेध बताये गए है। उनका अनुपालन हमें स्वस्थ बने रहने के लिए परम आवश्यक है। जैसे अधिक पानी पीने से है अजीर्ण, शुगर, बी पी आदि होने की संभावना बनी रहती है। इसलिए बिना प्यास के पानी पीना हानिकारक होता है। लेकिन आयुर्वेद में यह भी बताया गया है कि किन 3 परिस्थितियों में बिना प्यास के भी पानी पीना जरूरी है?
वह तीन परिस्थितियां है –
- सुबह सोकर उठते ही बिस्तर पर लगभग 250 एम एल
- भोजन करते समय बीच – बीच में कम से कम 150 एम एल
- भोजनोपरांत दो – दो घंटे बाद कम से कम दो बार लगभग आधा गिलास
यह मनुष्य को स्वस्थ रहने की आवश्यक और अनिवार्य जल सेवन की आयुर्वेदोक्त विधि है। जिसको अपनाने से हम अधिक समय तक, रोग और दोष से मुक्त रह सकते है।
उद्धरण :
- चरक संहिता सूत्र अध्याय
- सुश्रुत संहिता सूत्र अध्याय
- भावप्रकाश दिनचर्यादीप्रकरण